हम घर का राशन खरीदने बाजार निकले थे। किराने की दुकान पर पता चला कि सप्ताह भर पहले जो चावल बीस रूपये किलो था आज पच्चीस में मिल रहा था,दालें नब्बे रूपये किलो ,चीनी भी कुछ कम मंहगी न थी। सब्जियों के दाम तो और भी होश उड़ने वाले थे ,सौ रूपये में तीन किलो आलू ??दाम सुन सुन के दिल बैठा जा रहा था। अभी ही तो डीटीसी वालों ने भी किराया बढ़ा दिया ,दूध के दाम भी तो बढ़ते ही जा रहे हैं। घर मंहगे, खाना मंहगा,बिजली मँहगी,सफर करना मंहगा,पढ़ाई मँहगी,सब कुछ मंहगा???? ये कमरतोड़ मंहगाई हमें जाने किस दौर में पहुँचाने वाली है?डार्विन कि थेओरी के आधार पर "जो शक्तिशाली होगा वो ही जियेगा।"(जेब से शक्तिशाली)
ऐसा लगता है जैसे अब समाज में दो ही वर्ग रह पाएंगे। एक धनी और एक निर्धन। देश के उच्च पदों पर आसीन राजनेता इन सबके बारे में जाने क्या सोच रहे हैं?क्या कर रहे हैं?सोच भी रहे हैं या नही?आम आदमी बेचारा कम से कम कुछ सोच तो रहा है,ये अलग बात है कि वो सोचने के अलावा और कुछ कर भी नही सकता!!
Jee...........haan! mehngai kaafi badh gayi hai.........
जवाब देंहटाएंऐसा लगता है जैसे अब समाज में दो ही वर्ग रह पाएंगे। एक धनी और एक निर्धन........... yeh shuru se hai......... wealth ka concentration to hai hi.......
ji ha bilkul sahi boli hai ......
जवाब देंहटाएंसही कह रही हैं। अब सबको नेता बनने की तैयारी करनी चाहिए तभी दाल चावल नसीब होगा। देखा नहीं मधुकोड़ा का हाल।
जवाब देंहटाएंअबके मौसम
जवाब देंहटाएंआम चखने को भी
तरस गया मन
उनका उदारीकरण
इनका उधारीकरण
आपका पोखरण
मेरा चीरहरण
दरअसल सोच तो हम सकते हैं मगर नेता कर सकते हैं!
जवाब देंहटाएंमंहगाई एक तरह का जुल्म है या तो आप सहते रहें या फिर लड़ लें इससे!
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चिट्ठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है.
लिखते रहिये, शुभकामनाएं.
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महिलाओं के प्रति हो रही घरेलू हिंसा के खिलाफ [उल्टा तीर] आइये, इस कुरुती का समाधान निकालें!
दो ही वर्ग समाज में हमेशा से रहे हैं, शायद आगे भी रहें।
जवाब देंहटाएंमँहगाई की क्या कहूँ है प्रत्यक्ष प्रमाण।
मर जायेंगे दीन सभी जारी है अभियान।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
u have focused very good, but need to changing
जवाब देंहटाएंin goverment.
but we are not intresed , so what happened? such problems will come again and again bcz we are not accept it.
लेकिन हम यह क्यों भूल जाते हैं की इस स्तिथि की वजह हमारी उदासीनता और संकीर्णता भी है ...............
जवाब देंहटाएंhamesha yehi do varg the.
जवाब देंहटाएंhamesha do hi varg the.
जवाब देंहटाएंसबसे पहले तो ये बताईये कि पच्चीस में भी चावल मिल कहाँ रहा है? शायद आप कई दिनों से बाजार नहीं गई। आज ठीक ठाक चावल चालीस रूपये किलो से कम में नहीं मिलता, बढ़िया के तो भाव भी ना पूछें!
जवाब देंहटाएंपच्चीस रुपये में तो मोटे चावल मिलते हैं और बीस रुपये में कणकी (टुकड़े)।
बहुत ही सुन्दर रचना!लेकिन बाज़ार फिर जाइए,शायद आप बहुत पहले की बात कर रही है ,!!ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है...!पढ़ते रहिये और लिखते रहिये,मेरी शुभकामनायें...
जवाब देंहटाएंहिंदी ब्लॉग लेखन के लिए स्वागत और शुभकामनायें
जवाब देंहटाएंकृपया अन्य ब्लॉगों पर भी जाएँ और अपने सुन्दर
विचारों से अवगत कराएँ