मंगलवार, 22 दिसंबर 2009
हे! भगवन क्या करूँ इन रोड्छाप लुटेरों का??
सोमवार, 9 नवंबर 2009
मैं आज की युवा जनता हूँ!!!
गौर से देखो मुझे क्या किसी मॉडल से कम लगता हूँ।
चीन और पाकिस्तान हमले की साजिश रच रहे है
अरे!देश की सेना क्या कर रही है?
मैं बेखबर तो रोज डिस्को और पब जाता हूँ
जगह जगह आतंकी दहशत फैला रहे हैं
मैंने एक नज़र न्यूज़ चॅनल पर डाला है
वैसे मैं क्रिकेट और राखी का स्वयंवर देखता हूँ
सना है मंहगाई बेतहाशा बढ़ रही है,पापा है न?
मैं तो रोज मक्दोनाल्ड में ही खाता हूँ।
माँ, पापा ने सालों से नए कपड़े नही ख़रीदे ,पर मैं तो
लैपटॉप और आधुनिकतम मोबाइल खरीदूंगा
आखिर हाई क्लास दोस्तों के साथ रहता हूँ
नेता आजकल गुंडागर्दी करते है,वे बड़े भ्रष्ट और कामचोर हो गए हैं
मुझे दोष मत देना,
मैं तो चुनाव में वोट भी नही डालता हूँ।
देश की घिसी पिट्टी गरीबी,औरतों की असुरक्षा
अशिक्षा ,आतंकवाद,भ्रस्ताचार जैसी बातों के लिए समय नही
मैं आज का डॉक्टर,इंजिनीअर हूँ,
और एम् बी ऐ ,एम् सी ऐ करता हूँ!
हाँ मैं ही आज की युवा जनता हूँ!!!
शुक्रवार, 6 नवंबर 2009
प्रभाष जोशी जी को आखिरी नमन!!!
कल का दिन पत्रकारिता जगत में एक शोक की लहर सी छोड़ गया। प्रभाष जोशी जैसे महान पत्रकार हमारे बीच नही रहे। तीन महीने पहले ही हमारे दिल्ली विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के नए सत्रारंभ की गोष्ठी में मुख्य अतिथि बनकर वे आए थे। मैंने उनके ज्यादा लेख नही पढ़े,लेकिन उनके उत्साहपूर्ण भाषण को सुना। वहां और भी बड़े पत्रकार थे लेकिन उन्होंने तो हमें जैसे एक ही दिन में पत्रकारिता के सारे गुर सिखा दिए। कुछ मिनटों के भाषण में उन्होंने राजनीति,क्रिकेट,सचिन,टीवी के रियलिटी शो ,राखी सावंत,बाढ़ ,नेहरू जी ,कमला नेहरू और अन्य कई छोटे बड़े विषयों को इतनी खूबी के साथ समाहित किया कि हमें लगा ,बस उन्हें सुनते रहें। पत्रकारिता में पॉवर और पैसे के बढ़ते प्रभाव पर उन्होंने बड़ी चिंता व्यक्त की थी और कहा था कि आज जरुरत है सच्चे , ईमानदार और पत्रकारिता को समर्पित पत्रकारों की। अंत में उन्होंने कहा था कि जीवन का तो दूसरा नाम ही संघर्ष है,आप में से कई ऐसे होंगे जो शार्टकट लेकर पैसे और पॉवर कि तरफ़ खिंचे चले जायेंगे लेकिन कोई तो होगा जो इनको "ना"कहेगा , बस पत्रकारिता का दायित्व उसी "ना कहने वाले "पर टिका रहेगा।आज के दिन उन्हें श्रधांजलि देते हुए हम दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र बस इतना ही कहेंगे कि "अस्त्न्गामी सूर्य ने पूछा ,कौन करेगा इतना श्रम?नन्हा दीप कहीं से बोला , यथासाध्य हरूँगा तम्."
सोमवार, 2 नवंबर 2009
हाय! ये सुरसामुख मंहगाई!
हम घर का राशन खरीदने बाजार निकले थे। किराने की दुकान पर पता चला कि सप्ताह भर पहले जो चावल बीस रूपये किलो था आज पच्चीस में मिल रहा था,दालें नब्बे रूपये किलो ,चीनी भी कुछ कम मंहगी न थी। सब्जियों के दाम तो और भी होश उड़ने वाले थे ,सौ रूपये में तीन किलो आलू ??दाम सुन सुन के दिल बैठा जा रहा था। अभी ही तो डीटीसी वालों ने भी किराया बढ़ा दिया ,दूध के दाम भी तो बढ़ते ही जा रहे हैं। घर मंहगे, खाना मंहगा,बिजली मँहगी,सफर करना मंहगा,पढ़ाई मँहगी,सब कुछ मंहगा???? ये कमरतोड़ मंहगाई हमें जाने किस दौर में पहुँचाने वाली है?डार्विन कि थेओरी के आधार पर "जो शक्तिशाली होगा वो ही जियेगा।"(जेब से शक्तिशाली)
ऐसा लगता है जैसे अब समाज में दो ही वर्ग रह पाएंगे। एक धनी और एक निर्धन। देश के उच्च पदों पर आसीन राजनेता इन सबके बारे में जाने क्या सोच रहे हैं?क्या कर रहे हैं?सोच भी रहे हैं या नही?आम आदमी बेचारा कम से कम कुछ सोच तो रहा है,ये अलग बात है कि वो सोचने के अलावा और कुछ कर भी नही सकता!!
गुरुवार, 8 अक्टूबर 2009
बस थोडी सी आजादी की दरकार है
पिछले दिनों एक ख़बर सुर्खियों में थी की करण जोहर ने अपनी आगामी फ़िल्म में बॉम्बे शब्द के इस्तेमाल के लिए एक व्यक्ति विशेष से माफ़ी मांगी, आखिर यह माफियों का सिलसिला कब ख़तम होगा?क्या आजाद होकर भी हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिलनी अभी बांकी है?किस बात से डरकर ये माफियाँ मांगी जाती हैं?
क्या हम एक जनतांत्रिक देश में रहते हैं?