पागो हमारे घर आई थी,हमारे मामा के घर शादी थी और वो मौसी के साथ आयी थी,जहां रहती,वहां हलचल सी बनी रहती थी,उसकी उटपटांग बातें सबको हसने पर मजबूर कर देती थी.
उसे लोग पगली कह कर बुलाते हैं,लोग पूरी तरह गलत भी नही हैं,मैने उसे पहली बार तब देखा था, जब मैं छठी क्लास में थी और मौसी के घर गयी थी.गहरे काले रंग का शरीर लेकिन मुस्कुराता चेहरा,शक्ल से ही इमानदारी झलकती थी,बाल तो इतने काले कि लगता था कभी सफेद होंगे ही नही,
प्यार से मौसी के घर पर सभी उसे पागो कहते थे,वो उनके घर काम करने आती थी,बरतन धोना,कपडे धोना और घर के सारे काम करके फिर सबके पैर दबाना,यही उसके काम थे.लेकिन ये इतना आसान भी नही था अगर उसकी मर्जी होती थी तभी वो कुछ करती थी.
एक दिन वो मामा के घर से हमारे घर आई,साथ में एक आम लेकर आई थी,सबने पूछा कि आम किसलिए ?खाली हाथ कैसे आबो?वो बोली. जंगलों और पहाडों में रहने वाली उस संथाल औरत ने जो जवाब दिया वह आज सभ्य परम्परावादी भी भूलते जा रहे हैं,
दो साल मे वो अपने बाल मुडवा लेती थी,कहती थी ऐसे बिमार नही पडेगी,अगर पीठ मे दर्द होता तो गरम लोहे से दाग लेती,कहती दर्द खतम हो गया.जाने कौन से भगवान थे उसके? उसे घर मे जो चीज पसंद आ जाती उसे लिये बिना वो कोई काम नही करती थी.
एक बार वो बिमार पडी तो मौसी ने उसके पैर दबा दिये,तो बदले मे उसने पांच रू दिये और कहा ब्लाउज बाद मे देगी क्योंकि मौसी भी उसे वही देती थी.आजकल वो बिमार रहने लगी है,लेकिन मौसी के घर आना नही छोडती है,वजह शायद ये होगी कि
हर प्राणी प्यार और केवल प्यार का भूखा होता है और जहां उसे प्यार मिलता है वो वहां खिंचा चला जाता है.
शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010
गुरुवार, 9 दिसंबर 2010
शर्म करो यमदूतों !!
आई बी एन 7 पर ओपरेशन यमदूत ने पांच सितारा अस्पतालों को बेनकाब किया,कोबरा पोस्ट द्वारा दिया गया नाम ओपरेशन यमदूत अपने नाम को चरितार्थ करता नजर आता है, जब डॉक्टर किसी का सफल इलाज करते हैं तो हम उन्हे भगवान कहते हैं लेकिन वही डॉक्टर अगर लालच मे अंधे होकर गरीबों का खून चूसने लगें,अपना फर्ज भूल किसी का इलाज करने से इंकार कर दें और बस पैसे का गुलाम बन कर रह जायें तो वह यमदूत ही कहलाएंगे. हाल में ही कई नामी गिरामी आधुनिक साधनों से लैस अस्पतालों में स्टींग ओपरेशन किये गये,इन ओपरेशनों में जो सच्चाई उभर कर सामने आई वो सचमुच परेशान कर देती है.
मैक्स,रोक्लेंड,बत्रा,जीएम मोदी,पुष्पावती सिंघानिया,फोर्टीस अस्पताल जैसे दिल्ली के चालीस पांचसितारा अस्पतालों को सरकार ने रियायती दर पर जमीन इस शर्त पर दी थी कि वो बीपीएल कार्ड धारकों और चार हजार रुपये से कम आय वाले मरीजों का मुफ्त इलाज करेंगे,साथ ही अस्पतालों के दस फीस्दी बेड गरीबों के लिये रहेंगे, लेकिन ये सारे प्राईवेट अस्पताल इन नियमों की धज्जियां उडा रहे हैं,
हर जगह बेचारे गरीबों को मिलती है धमकी,दुत्कार,दफा हो जाने की नसीहत,वे कहते हैं पैसे कहां से दोगे?नही दोगे तो सरकारी अस्पताल जाओ,
ये अस्पताल तो प्राइवेट हैं,लेकिन क्या सरकारी अस्पताल गरीबों को न्याय दे रहे है? क्या वे अपने फर्ज का निर्वाह कर रहे है,जरूरत है ओपरेशन यम्दूत आगे जारी रखने की,तभी वो कडवी सच्चाई (जिससे वहां इलाज करवाने वाले तो भलीभांति वाकिफ हैं लेकिन सरकार अंजान बनी बैठी है) सामने आयेगी,
यमदूत बने इन डॉक्टरों को मरीज और गम्भीर होती उसकी स्थिति से कोई सरोकार नही होता इन्हें बस पैसों की चिंता होती है,
वैसे गरीबों के जीवन का औचित्य ही क्या है?खासकर ऐसे जगहों पर जहां चमकते दमकते लोगों का आना जाना लगा रह्ता हो,जहां बडे लोग अपनी एक छींक पर भी रुपयों के ढेर लुटाने को तैयार बैठे हों,ऐसी शान बान वाले अमीरों की तीमारदारी छोड डॉक्टर भला क्यों कंगालों की टूटती सांसों की डोर को थामेंगे,
टीवी पर कुछ दिनों पहले ही दिखाया गया था कि एक्सीडेंट में घायल एक आदमी कैसे रात भर इलाज के लिये तडपता रहा लेकिन उसे फर्स्ट एड तक नही मिल पाया,और वो बदनसीब मर गया.बडे बडे अस्पतालों का कोई छोटा सा डॉक्टर या नर्स भी उसे अपना कीमती समय ना दे पाये. दिल्ली जैसे शहर में इंसान की जिंदगी इतनी सस्ती और इलाज इतना मंहगा? ये बडा हास्यास्पद है लेकिन दुर्भाग्यवश यही सच है.
जैसा कि हर बडे खुलासे पर सरकार व सम्बंधित मंत्रियों का कार्य होता हैकिउच्चस्तरीय जांच के आदेश दे दिये जाते है वैसा हो गया है ,अब आगे आगे देखिये होता है क्या?स्टींग ओपरेशन के खुपिया कैमरे के सामने जो बेनक़ाब हो चुके है,वो अपनी बेशर्मी को किस नये पर्दे से ढकेंगे
मैक्स,रोक्लेंड,बत्रा,जीएम मोदी,पुष्पावती सिंघानिया,फोर्टीस अस्पताल जैसे दिल्ली के चालीस पांचसितारा अस्पतालों को सरकार ने रियायती दर पर जमीन इस शर्त पर दी थी कि वो बीपीएल कार्ड धारकों और चार हजार रुपये से कम आय वाले मरीजों का मुफ्त इलाज करेंगे,साथ ही अस्पतालों के दस फीस्दी बेड गरीबों के लिये रहेंगे, लेकिन ये सारे प्राईवेट अस्पताल इन नियमों की धज्जियां उडा रहे हैं,
हर जगह बेचारे गरीबों को मिलती है धमकी,दुत्कार,दफा हो जाने की नसीहत,वे कहते हैं पैसे कहां से दोगे?नही दोगे तो सरकारी अस्पताल जाओ,
ये अस्पताल तो प्राइवेट हैं,लेकिन क्या सरकारी अस्पताल गरीबों को न्याय दे रहे है? क्या वे अपने फर्ज का निर्वाह कर रहे है,जरूरत है ओपरेशन यम्दूत आगे जारी रखने की,तभी वो कडवी सच्चाई (जिससे वहां इलाज करवाने वाले तो भलीभांति वाकिफ हैं लेकिन सरकार अंजान बनी बैठी है) सामने आयेगी,
यमदूत बने इन डॉक्टरों को मरीज और गम्भीर होती उसकी स्थिति से कोई सरोकार नही होता इन्हें बस पैसों की चिंता होती है,
वैसे गरीबों के जीवन का औचित्य ही क्या है?खासकर ऐसे जगहों पर जहां चमकते दमकते लोगों का आना जाना लगा रह्ता हो,जहां बडे लोग अपनी एक छींक पर भी रुपयों के ढेर लुटाने को तैयार बैठे हों,ऐसी शान बान वाले अमीरों की तीमारदारी छोड डॉक्टर भला क्यों कंगालों की टूटती सांसों की डोर को थामेंगे,
टीवी पर कुछ दिनों पहले ही दिखाया गया था कि एक्सीडेंट में घायल एक आदमी कैसे रात भर इलाज के लिये तडपता रहा लेकिन उसे फर्स्ट एड तक नही मिल पाया,और वो बदनसीब मर गया.बडे बडे अस्पतालों का कोई छोटा सा डॉक्टर या नर्स भी उसे अपना कीमती समय ना दे पाये. दिल्ली जैसे शहर में इंसान की जिंदगी इतनी सस्ती और इलाज इतना मंहगा? ये बडा हास्यास्पद है लेकिन दुर्भाग्यवश यही सच है.
जैसा कि हर बडे खुलासे पर सरकार व सम्बंधित मंत्रियों का कार्य होता हैकिउच्चस्तरीय जांच के आदेश दे दिये जाते है वैसा हो गया है ,अब आगे आगे देखिये होता है क्या?स्टींग ओपरेशन के खुपिया कैमरे के सामने जो बेनक़ाब हो चुके है,वो अपनी बेशर्मी को किस नये पर्दे से ढकेंगे
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