मंगलवार, 22 दिसंबर 2009
हे! भगवन क्या करूँ इन रोड्छाप लुटेरों का??
हाल ही में मै डाकघर से अपना टेलीफ़ोन का बिल जमा कर वापस घर आ रही थी। घर से ज्यादा दूरी पे नहीं थी मै,रास्ता थोड़ा सुनसान सा था पर ज्यादा नहीं। एक लड़का अचानक मेरे साथ साथ चलने लगा मैंने ध्यान न देते हुए अपना मोबाइल निकाल किसी को फ़ोन करने की कोशिश की,बस उसे तो शायद इसी पल का इंतज़ार था,उसने झट से मेरे हाथ से मोबाइल छीना और भागने को हुआ पर एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया के अनुरूप मेरे हाथ मे उसकी टीशर्ट (जो पूरी बाजू की थी)आ गयी। मुझे अभी भी विश्वास था की मै अपना प्यारा और मंहगा मोबाइल वापस छीन लूँगी लेकिन अचानक पीछे से उसका एक साथी जो बाईक पर सवार था वो आ गया उसने मेरे हाथ से छुड़ाकर अपने साथी को साथ बिठाया और मेरी आँखों के सामने उड़न छू हो गया ,इस अप्रत्याशित घटना की कल्पना मैंने कभी नहीं की थी,न उनमे से कोई कर सकता है जो ऐसे हादसों के शिकार होते हैं । जाने इन चोरों की कैसी मानसिकता होती है कि मेहनत कर लोग जो पैसे कमाते हैं,चीजें खरीदते हैं , ये एक पल में उसे छीन कर या चुरा कर अपने नाम कर लेते हैं । अब चोर लुटेरे इतने बुद्धिजीवी तो नहीं होंगे कि मेरा ब्लॉग पढ़ सकें ,पर काश हम देख पाते कि चोरियों और इन छिछोरी हरकतों से क्या वे अपनी किस्मत बदल पाए ? दिल्ली पुलिस का हाल न ही लिखूं तो बेहतर है,क्योंकि सभी उन्हें भलीभांति जानते हैं।
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